Read this post “The dual nature of its democracy is at the heart of understanding India” – Simon Denyer in English.

अपनी नई पुस्तक, रोग एलीफेंट: हार्नेसिंग द पॉवर ऑफ़ इंडियाज़ अनरूली डेमोक्रेसी,  में पत्रकार साइमन डिनायर लिखते हैं कि “[भारत में] बदलाव मुमकिन है और ऐसा होकर रहेगा ।” विदेश संवाददाता के तौर पर पहले रायटर और फिर वाशिंगटन पोस्टके लिए भारत के ब्यूरो चीफ़ के रूप में कार्य करने के दौरान देखे गए बदलावों के बारे में वे यहां इंडिया एट एलएसई में अपने अनुभवों का साझा कर रहे हैं। यहां उन्होंने यह भी जिक्र किया है कि भारत में नई सरकार के शासन में आगे और कौन से बदलाब हो सकते हैं।

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प्र. रोग एलीफेंट, में आपने भारतीय लोकतन्त्र को “अनूठा” बताया है। ऐसा क्या है जो इसे अनूठा बनाता है? 

उ. भारतीय लोकतन्त्र में एक अनोखा तनाव मौजूद है एक स्तर पर देखें तो लोकतन्त्र ने भारत को एकजुट किया है और राष्ट्र को इस तरह से एक साथ लाकर खड़ा कर दिया है जिसकी भारतीय लोकतंत्र के निंदकों ने उम्मीद भी नहीं की थी – यही भारत की सबसे बड़ी ताकत है। लेकिन एक अन्य स्तर पर देखें तो, यही भारत की सबसे खराब चीज भी है। चीन [ जहां डिनायर अब वाशिंग्टनपोस्टके चीन ब्यूरो चीफ हैं] के नजरिए से भारत को देखें तो, वहां के लोग कहते हैं कि भारतीय लोकतन्त्र डरावना है – यह अपराध, भ्रष्टाचार, लोकलुभावनवाद और ऐसे राजनेताओं से ग्रस्त है जो कुछ भी अच्छा नहीं करते। पंथनिरपेक्ष, लोकतान्त्रिक राष्ट्र के नेहरूवादी आदर्शों और भारत की शिथिल संसद के बीच का तनाव – यानी भारतीय लोकतन्त्र की दोहरी प्रकृति – भारत को समझने के मूल में है।

भारतीय लोकतन्त्र का एक तीसरा पहलू भी है जो अब अधिक महत्वपूर्ण होता जा रहा है :  लोकतन्त्र पर मात्र लोगों को एकजुट रखने की ही जिम्मेदारी नहीं होती, असल में इसे कुछ और भी करके दिखाना होता है। और, लोकतन्त्र को क्या करके दिखाना चाहिए इस बारे में अपेक्षाएं मध्य वर्ग के साथ और मीडिया तथा प्रौद्योगिकी के उभार साथ बढ़ी हैं। लोगों ने यह समझ लिया है कि उन्हें ऐसे राजनेताओं की जरुरत है जो काम करके दिखायें और उनकी आकांक्षाओं को साकार करने के अवसर प्रदान करें।

प्र. आप 2004 में भारत आए थे जब भारत ‘रोशन'(इंडिया शाइनिंग) हो रहा था और आपकी पुस्तक ऐेसे समय में प्रकाशित हुई है जब वह संघर्ष कर रहा है। इस परिवर्तन के लिए आपके विचार में कौन उत्तरदायी है?

उ. कांग्रेस पार्टी की अविश्वसनीय अकुशलता, मनमोहन सिंह में नेतृत्व का अभाव, पार्टी में चापलूसी की प्रवृत्ति और गांधी परिवार को चुनौती देने में कांग्रेस पार्टी की अक्षमता। मेरे विचार में, कांग्रेस को 2009 में जो जनादेश मिला, जो कि मुझे लगता है कि पार्टी की गरीब-समर्थक नीतियों की बजाए मनमोहन सिंह और आर्थिक विकास के लिए मिला था, कांग्रेस ने जान-बूझकर उसे गलत अर्थों में लिया। पार्टी ने इसे राहुल गांधी को मिले जनादेश के रूप में तब्दील करने की कोशिश की।

परिवर्तन के पीछे मौजूद इन अंतर्निहितकारणों के अलावा, मुझे लगता है कि भारत में यह बदलाव कॉमनवेल्थ गेम्स के इर्द-गिर्द मौजूद घोटालों और टूजी घोटाले के कारण भी हुआ। इन बातों ने इस विचार की हवा निकाल दी कि भारत अगली महाशक्ति बनने जा रहा है। मान लिया गया था कि दूरसंचार कंपनियां भारत की विजयगाथा लिख रही हैं, इसलिए प्रधानमन्त्री की नाक के नीचे मंत्रीमंडल के स्तर पर हुए 2जी घोटाले ने लोगों को सदमे में डाल दिया और उन्हें यह सोचने पर मजबूर कर दिया कि पैसों की चोरी करने के अलावा यह सरकार और कुछ कर ही नहीं रही।

प्र. आपने मनमोहन सिंह की लोकस्वीकृति में गिरावट को अपनी पुस्तक में भी दस्तावेजी रूप दिया है और इससे पहले पत्रकार के रूप में भी, जो कि कहीं अधिक विवादास्पद था। क्या आपको लगता है कि मनमोहन सिंह ने जो पीछे छोड़ा है उससे कांग्रेस और भारत कुछ सीखेंगे, और अगर सीखेंगे तो वह क्या होगा?

उ. कांग्रेस पार्टी को एक नई दिशा तय करने की जरूरत है और गांधी परिवार की अन्धभक्ति से हटकर कुछ अलग सोचने की जरूरत है। मनमोहन सिंह की एक मुख्य विफलता थी सोनिया गांधी के प्रति उनकी वफादारी।

व्यापक तौर पर कहें तो, मुझे लगता है कि भारत यह पहचानेगा कि देश को किसी गठबन्धन के तौर पर उस नेतृत्व क्षमता के बगैर भी चलाया जा सकता है जिसका मनमोहन में अभाव था। [भाजपा के प्रधानमन्त्री पद के प्रत्याशी] नरेन्द्र मोदी, मनमोहन सिंह के विलोम हैं : उनकी मजबूत इच्छा-शक्ति और आत्मनिर्भरता चिन्तित करती है। राजनेताओं को भी यह समझ में आने लगा है कि उन्हें लोगों की आकांक्षाओं पर खरा उतरना होगा, काम करके दिखाना होगा, और वह भी केवल मध्यवर्ग के लिए नहीं बल्कि ग्रामीण मतदाताओं के लिए भी।

प्र. पुस्तक में आपने भारतीय लोकतन्त्र पर वंशवादी राजनीति के असर के बारे में और एक अलगथलग रहने वाले राजनेता की छवि होने के बावजूद राहुल गांधी के हाथो कांग्रेस पार्टी को पुनर्जीवित करने के प्रयासों के बारे में लिखा है। आपके विचार में, 2014 के चुनावों में खराब प्रदर्शन करने के बाद कांग्रेस का भविष्य क्या है और समग्र रूप से भारतीय लोकतन्त्र पर इसका क्या असर होगा?

उ. आप अभी यह नहीं कह सकते कि कांग्रेस पार्टी खत्म हो गई है, पर इतनी अपमानजनक पराजय से उबरने में काफी लम्बा समय लग जाता है। भाजपा को 2004 की अपनी छोटी पराजय से उबरने में और जिन बातों की वह समर्थक है उसके लिए खुद को तैयार करने में काफी समय लगा। इसी तरह, कांग्रेस को भी अब खुद से पूछना होगा कि क्या उसका वजूद गांधी परिवार के अलावा किसी अन्य चीज के लिए भी है। आखिरकार, भारतीय राजनीति में कांग्रेस की एक भूमिका तो है, खासतौर पर यह देखते हुए कि भारत को मजबूत राष्ट्रीय दलों की जरूरत है। पर पहले उसे खुद की जांच-पड़ताल में एक लम्बा समय गुजारना होगा।

प्र. इस बार के चुनावों में खुद भारतीय मीडिया भी सवालों के घेरे में रहा है और मीडिया, कॉर्पोरेशन तथा राजनीति के सम्बन्धों के बारे में चिन्ताएं प्रकट की गई हैं। लेकिन रोग एलीफेंट में आप मीडिया की तारीफ करते हुए कहते हैं कि यह अपने उद्देश्य को “दोषयुक्त ढंग से लेकिन पूरे उत्साह के साथ” पूरा करता है। आपके अनुसार मीडिया का सबसे अधिक असर कैसे पड़ा है?

उ. 2004 के चुनावों से भी ज्यादा, इस बार के चुनाव एक राष्ट्रीय विषय पर आधारित थे: कांग्रेस भगाओ, मोदी लाओ। मीडिया ने इस राष्ट्रीय विषय को विकसित होने और फैलने में मदद की। यह सच है कि बाकी देशों की ही तरह यहां भी मीडया राजनीति को ध्यान खींचने वाले छोटे-छोटे बयानों और सनसनी फैलाने वाली खबरों के स्तर तक लाता है और सम्भवतः नकारात्मक राजनीति की संस्कृति को भी उकसाता है। पर इन्हीं चीज़ों के सहारे मीडिया ने मोदी के सन्देश को फैलाने में मदद की।

कुल मिलाकर, भारतीय मीडिया ने भारतीय राजनीतिज्ञों को जवाबदेही स्वीकारने पर विवश करने का कमाल का काम किया है और यह भारत की जरुरत भी है कि सत्ता से जुड़ी दिव्यता का आवरण सोच से अलग हो। इस सन्दर्भ में मैं और अधिक खोजी एवं निष्पक्ष पत्रकारिता देखना चाहूंगा। जब मैंने भारत छोड़ा था, उस समय मोदी के गुजरात का ऐसा अच्छा विश्लेषण खोज पाना बहुत मुश्किल था जो बंधे-बंधाये सोच के ढर्रे पर आधारित न हो। टीवी और प्रिंट मीडिया की सबसे बड़ी विफलता यह रही है कि उसमें जमीनी स्तर पर जाने और गहराई से रिपोर्ट करने की इच्छा का अभाव रहा है।

प्र. अपनी पुस्तक में आपने लिखा है कि भाजपा के नरेन्द्र मोदी “ऐसी कई चीज़ों को खतरे में डाल रहे हैं जो कि भारत के बारे में आपको पसंद हैं।” भारतीय मतदाताओं के बीच उनका जो आकर्षण है उसका कारण क्या है और भारतीय लोकतन्त्र के लिए इसका क्या मतलब हो सकता है?

उ. मोदी मजबूत, निर्णायक नेतृत्व का प्रतिनिधित्व करते हैं जबकि भारत के पास कमजोर और बेअसर नेतृत्व रहा था। वे खुद को (बुरी राजनीति से) बाहर के एक ऐसे व्यक्ति के रूप में पेश करते हैं जो सत्ता पर एकाधिकार जमाए बैठे और अपनों को रेवड़ी बांट रहे अभिजात वर्ग के चक्रव्यूह को तोड़ सकता है। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि वे खुद को एक ऐसे व्यक्ति के रूप में पेश करते हैं जो लोगों को उनकी आकांक्षाएं पहचानने और साकार करने में मदद कर सकता है। युवा और वृद्ध, दोनों ही तरह के भारतीय ऐसे राजनीतिज्ञों से तंग आ चुके हैं जो शासन संभालने में असमर्थ या अनिच्छुक दिखाई पड़ते हैं और मोदी, शासन संभालने की इच्छाशक्ति का प्रतिनिधित्व करते हैं।

एक तरह से, मोदी का आकर्षण भारतीय लोकतन्त्र की परीक्षा है। कुछ वर्ष पहले लोग भारत को खत्म हुआ मान रहे थे और कह रहे थे कि यह टूटी-फूटी गठबंधन सरकारों और कमजोर नेतृत्व द्वारा परिभाषित होगा। मोदी ने उन्हें दिखा दिया है कि सशक्त नेतृत्व अभी भी सम्भव है। उम्मीद यह की जाती है कि मोदी की ताकत भारत की अन्य लोकतान्त्रिक संस्थाओं – मीडिया, सर्वोच्च न्यायालय, संघीय-राज्य ढांचा, अर्थात् भारतीय लोकतन्त्र के नियन्त्रण और सन्तुलन की व्यवस्था – के साथ मिलकर उन्हें एक और इन्दिरा गांधी बनने से रोके और इसकी जगह यह सिद्ध करे कि भारत सबको साथ लेकर चलने वाला नेतृत्व और सरकार दे सकता है।

बहरहाल, मोदी के बारे में मेरी दो चिन्ताएं हैं : पहली तो ये कि उनका सत्ता के केन्द्र में होना मुस्लिमों को अलग-थलग करेगा और चरमपंथियों को नई भर्तियों के लिए उकसाएगा। और दूसरी यह कि, जैसा कि देखने में आता है, मोदी विरोध और आलोचना के प्रति असहज हैं अतः वे मीडिया पर दबाव बढ़ाएंगे। यह क्या रुप लेता है और मीडिया कैसे प्रतिक्रिया देता है यह देखना बेहद रोचक रहेगा।

प्र. भारत का मोदी के नेतृत्व में होना, क्षेत्रीय स्थिरता के लिए, विशेषकर चीन और पाकिस्तान के साथ भारत के सम्बन्धों के लिए क्या अर्थ रखता है?

उ. चीन कई कारणों से मोदी को प्रधानमन्त्री के रूप में देखने के लिए आशावान है। वे वहां दो बार जा चुके हैं और खुद को चीन के दोस्त के रूप में पेश कर चुके हैं। वे सशक्त नेता भी हैं और चीनी लोग शक्ति को सम्मान देते हैं। इसके अतिरिक्त, चूंकि मोदी और वाशिंगटन के बीच तल्खियां रही हैं अतः चीनी लोग सोचते हैं कि वे संयुक्त राज्य अमेरिका के बहुत अच्छे मित्र नहीं होंगे। मुझे नहीं लगता कि यह बात इतनी सीधी-सादी और साफ है। मुझे लगता है कि मोदी आर्थिक कारणों के चलते चीन और संयुक्त राज्य अमेरिका, दोनों से अच्छे रिश्ते बनाएंगे। भाजपा भी पारम्परिक रूप से कांग्रेस की तुलना में अमेरिका के प्रति अधिक झुकाव रखती है। हालांकि चीन में मोदी को लेकर सकारात्मक उम्मीदें हैं पर मुझे लगता है कि वे दोनों सम्बन्धों की नाप-जोख अधिक बारीकी से करेंगे।

जहां तक पाकिस्तान की बात है, मुझे नहीं लगता कि मोदी, भारत और पाकिस्तान के बीच शान्ति स्थापित करने वाले सशक्त नेता [अटल बिहारी] वाजपेयी के बराबर पहुंच सकते हैं। और इसके भी कई कारण हैं : सरहद पार साझेदारी के लिए मोदी के पास [परवेज़] मुशर्रफ़ जैसा कोई नेता नहीं है; अमेरिका के अफगानिस्तान से जाने के मद्देनजर क्षेत्रीय स्थितियां अनिश्चित हो गई हैं; और एक कारण यह भी है कि मोदी, वाजपेयी नहीं हैं। पाकिस्तान के साथ सम्बन्ध असहज ही रहने वाले हैं।

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